PODCAST

In this episode, we are going to talk about reasons as to why companies launch IPOs. On case you have also been wondering why ...

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कंपनियां पैसे जुटाने के लिए पब्लिक के पास क्यों जाती हैं, क्यों IPO का रास्ता चुनती हैं?

जब भी कोई कंपनी IPO लाने का फैसला करती है तो आमतौर पर वो कारोबार बढ़ाने के लिए कैपेक्स जुटाना चाहती है। इस रास्ते में कंपनी को तीन फायदे होते हैं :

1. कंपनी को कैपेक्स के लिए पैसे मिल जाते हैं।
2. कंपनी कर्ज लेने से बच जाती है, कर्ज पर ब्याज बचने से कंपनी के पास मुनाफे के तौर पर ज्यादा पैसे बचते हैं।
3. जब आप कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो कंपनी के प्रमोटर की तरह रिस्क में आप भी हिस्सेदार बन जाते हैं। हालांकि रिस्क इस पर निर्भर करता है कि आपके पास कितने शेयर हैं। लेकिन प्रमोटर अपना रिस्क बहुत सारे लोगों में बाँटने में जरूर कामयाब हो जाता है।

इसके अलावा IPO के जरिए पूंजी जुटाने के कुछ और भी फायदे हैं:
1. कंपनी के शुरुआती निवेशकों को अपना निवेश निकालने का मौका मिल जाता है: जब IPO के बाद कंपनी लिस्ट हो जाती है तो उसके शेयर कोई भी खरीद और बेच सकता है। इससे कंपनी के प्रमोटर, ऐंजल इन्वेस्टर, वेंचर कैपिटलिस्ट, PE फंड, जैसे तमाम लोगों को अपने शेयर बेचने का रास्ता मिल जाता है। इस तरह से वो अपना शुरूआती निवेश निकाल पाते हैं।
2. कंपनी के कर्मचारियों को पुरस्कार: कंपनी में पहले से काम कर रहे कर्मचारियों को कुछ शेयर एलॉट किए जा सकते हैं। इस तरह से जब कंपनी अपने कर्मचारियों को शेयर देती है तो इस समझौते को एम्पलाइज स्टॉक आप्शन (Employee Stock Option) कहते हैं। कर्मचारियों को ये शेयर डिस्काउंट पर दिए जाते हैं। जब कंपनी के शेयर IPO के बाद लिस्ट होते हैं तो कर्मचारियों को शेयर के भाव बढ़ने से फायदा होता है। गूगल, इन्फोसिस, ट्विटर और फेसबुक जैसी कंपनियों के कर्मचारी इस तरह के स्टॉक आप्शन का फायदा पा चुके हैं।
3. कंपनी का नाम बढ़ता है: पब्लिक लिस्टिंग के बाद कंपनी का नाम बड़ा हो जाता है क्योंकि उसके शेयरों में पब्लिक की हिस्सेदारी होती है और लोग उसे खरीद-बेच सकते हैं, और लोग उस कंपनी के बारे में ज्यादा जानने लगते हैं।
IPO से जुड़े कामों का घटनाक्रम ( IPO sequence of events):

IPO में हर कदम सेबी के नियमों के मुताबिक ही उठाना होता है। और ये कदम इस क्रम में उठाए जाते हैं:
1. मर्चेंट बैंकर की नियुक्ति. बड़े पब्लिक इश्यू में एक से ज्यादा मर्चेंट बैंकर हो सकते हैं।
2. सेबी को एक रजिस्ट्रेशन स्टेटमेंट के साथ एप्लीकेशन देना. रजिस्ट्रेशन स्टेटमेंट में ये बताया जाता है कि कंपनी क्या करती है, उसे IPO लाने की जरूरत क्यों है और कंपनी की वित्तीय स्थिति क्या है।
3. सेबी से IPO की मंजूरी लेना. रजिस्ट्रेशन स्टेटमेंट मिलने के बाद सेबी फैसला करती है कि मंजूरी देनी है या नहीं।
4. DRHP- इश्यू को शुरूआती मंजूरी मिलने के बाद कंपनी को अपना DRHP यानी ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस तैयार करना होता है। इसे पब्लिक के साथ भी शेयर किया जाता है। DRHP में जो जानकारी होनी जरूरी हैं वो हैं :
5. IPO का साइज यानी कितना बड़ा IPO होगा
6. कुल कितने शेयर जारी किए जा रहे हैं
7. कंपनी इश्यू क्यों ला रही है और उससे जुटाए गए पैसों का क्या इस्तेमाल किया जाएगा।
8. कंपनी के बिजनेस का पूरा ब्यौरा, बिजनेस मॉडल, खर्चे आदि
9. सभी फाइनेंशियल कागजात
10. मैनेजमेंट का नजरिया कि आने वाले समय में कंपनी का करोबार कैसा रहने वाला है।
11. बिजनेस से जुड़े सभी रिस्क
12. मैनेजमेंट से जुड़े लोगों की पूरी जानकारी।

- IPO की मार्केटिंग (Market the IPO)- कंपनी के IPO से जुड़े विज्ञापन जारी करना जिससे लोगों को आई पी ओ के बारे में पता चल सके। इसी काम को रोड शो भी कहते हैं।
- प्राइस बैंड तय करना- कंपनी बाजार की उम्मीद से बहुत अलग प्राइस बैंड नहीं बना सकती नहीं तो लोग इसको सब्सक्राइब नहीं करेंगे।
- बुक बिल्डिंग (Book Building)- रोड शो पूरा हो जाने के बाद और प्राइस बैंड तय होने के बाद कंपनी को आधिकारिक तौर पर कुछ दिनों के लिए शेयर का सब्सक्रिप्शन खोलना होता है जिससे लोग इश्यू में पैसे लगा सकें। मान लीजिए प्राइस बैंड 100 से 120 का है तो बुक बिल्डिंग से पता चल जाएगा कि लोग किस कीमत पर पैसे लगा रहे हैं और कौन सी कीमत उन्हें सही लग रही है। इस सारी जानकरी को जमा करना ही बुक बिल्डिंग कहा जाता है। इससे सही कीमत का अंदाजा लगाया जाता है।
- क्लोजर (closure)– बुक बिल्डिंग पूरा हो जाने के बाद शेयर की लिस्टिंग कीमत तय की जाती है। ये कीमत आमतौर पर वो कीमत होती है जिस पर सबसे ज्यादा एप्लीकेशन या अर्जी आई हों।
- लिस्टिंग डे (Listing Day)- इस दिन कंपनी का शेयर एक्सचेंज पर लिस्ट होता है। लिस्टिंग कीमत उस दिन शेयर की माँग और सप्लाई के आधार पर तय होती है। इसके बाद शेयर अपने कट ऑफ कीमत से प्रीमियम, पार या डिस्काउंट पर लिस्ट होता है।

IPO के बाद क्या होता है? (What happens after the IPO?)
जब तक IPO या इश्यू खुला रहता है तब तक निवेशक IPO के प्राइस बैंड के भीतर अपनी पसंद की कीमत पर शेयर के लिए बोली लगा सकते हैं या बिड कर सकते हैं, तब तक इसे प्राइमरी मार्केट कहते हैं। लेकिन जैसे ही शेयर एक्सचेंज पर लिस्ट हो जाता है कोई भी उस शेयर को खरीद बेच सकता है, इसे सेकेंडरी मार्केट कहते हैं। इसके बाद शेयर की खरीद बिक्री रोजाना होने लगती है।

Understanding the stock market could turn out to be a daunting task for a beginner, which is why we have explained the key te ...

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शेयर बाज़ार में प्रयोग होने वाले शब्द

इस चैप्टर में आपको उन शब्दों का मतलब समझाया जाएगा जिनका इस्तेमाल शेयर बाज़ार के जानकार लोग लगातार करतें हैं।

- बुल मार्केट (तेजी): अगर किसी को लगता है कि बाजार ऊपर जाएगा और शेयरों की कीमत बढ़ेगी तो कहा जाता है कि वो तेजी में है। अगर एक तय समय में बाजार लगातार ऊपर की तरफ जाता रहता है तो कहा जाता है कि बाजार बुल मार्केट में है, या फिर बाज़ार में तेजी का माहौल है।

- बेयर मार्केट (मंदी): तेजी के माहौल का ठीक उल्टा मंदी का माहौल होता है। अगर आपको लगता है कि आने वाले समय में बाजार नीचे की तरफ जाएगा तो कहा जाता है कि आप उस स्टॉक को लेकर बेयरिश (Bearish) हैं। इसी तरह जब एक लंबे समय तक बाजार नीचे की तरफ जा रहा होता है तो कहा जाता है कि बाजार बेयर मार्केट में है।

- ट्रेंड: बाजार की दिशा और उस दिशा की ताकत को ट्रेंड कहा जाता है । उदाहरण के लिए, अगर बाजार तेजी से नीचे जा रहा है तो कहते हैं कि बाजार में गिरावट का ट्रेंड है या अगर बाजार ना उपर जा रहा है ना अधिक नीचे तो उसे “साइडवेज” या दिशाहीन ट्रेंड कहा जाता है।

- शेयर की फेस वैल्यू: किसी शेयर की तय कीमत को फेसवैल्यू या “पार वैल्यू” कहते हैं। इसे कंपनी तय करती है और ये उनके कॉरपोरेट फैसलों के लिए महत्वपूर्ण होता है, जैसे डिविडेंड देने या स्टॉक स्प्लिट करने के समय कंपनी शेयर की फेस वैल्यू को ही आधार बनाती है। उदाहरण के लिए, अगर इन्फोसिस के शेयर की फेस वैल्यू 5 रूपए है और कंपनी ने 63 रूपए का सालाना डिविडेंड दिया तो इसका मतलब है कि कंपनी ने 1260% डिविडेंड दिया। (65÷5) 52 हफ्तों की ऊँचाई/निचाई (52 week high/low) : 52 हफ्ते की ऊँचाई का मतलब है कि स्टॉक की पिछले 52 हफ्तों में सबसे ऊँची कीमत। इसी तरह 52 हफ्तों की निचाई मतलब सबसे निचली कीमत 52 हफ्तों में। 52 हफ्तों की ऊँची या नीची कीमत स्टॉक की कीमत का दायरा बताता है। जब कोई स्टॉक अपने 52 हफ्तों की ऊँचाई के करीब होता है तो कई लोग ऐसा मानते हैं कि स्टॉक तेजी में रहने वाला है, इसी तरह जब स्टॉक अपने 52 हफ्ते के निचले स्तर के करीब होता है तो ऐसा माना जाता है कि स्टॉक मंदी में रहने वाला है।

- पूरे वक्त की ऊँचाई/निचाई (All time high/ low): ऑल टाइम हाई और ऑल टाइम लो भी 52 हफ्तों की ऊँचाई या निचाई की तरह स्टॉक की कीमत बताता है, फर्क सिर्फ इतना है कि ऑल टाइम हाई या लो किसी स्टॉक के बाजार में लिस्ट होने के बाद से अब तक की सबसे ऊँची कीमत या नीची कीमत बताता है।

- अपर सर्किट/लोअर सर्किट (Upper Ciruit / Lower circuit): स्टॉक एक्सचेंज हर स्टॉक के लिए कीमत की एक सीमा तय कर देते हैं। एक ट्रेडिंग दिन में स्टॉक की कीमत उस सीमा के बाहर नहीं जाने दी जाती है, ना ऊपर की तरफ और ना ही नीचे की तरफ। ऊपरी कीमत की सीमा को अपर सर्किट और कीमत की निचली सीमा को लोअर सर्किट कहते हैं। स्टॉक की सर्किट की सीमा 2%, 5%, 10%, या 20% में से कुछ भी हो सकती है जो एक्सचेंज अपने नियमों के हिसाब से तय करते हैं। एक्सचेंज सर्किट का इस्तेमाल स्टॉक में जरूरत से ज्यादा उतार चढ़ाव को काबू में रखने के लिए करते हैं ताकि किसी खबर की वजह से स्टॉक में बहुत ज्यादा गिरावट या तेजी ना आए।

- लाँग पोजिशन (Long Position): लाँग पोजीशन या लाँग होना आपके सौदे यानी ट्रेड की दिशा बताता है। उदाहरण के तौर पर अगर आपने बायोकॉन के शेयर खरीदे हैं या खरीदने वाले हैं तो आप बायोकॉन पर लाँग हैं। अगर आपने निफ्टी इंडेक्स इस उम्मीद पर खरीदा है कि इंडेक्स ऊपर जाएगा तो आपकी इंडेक्स पर लांग पोजीशन है। अगर आपकी किसी स्टॉक या इंडेक्स पर लाँग पोजीशन है तो आपको तेजी वाला ट्रेडर या बुलिश (Bullish) माना जाएगा।

- शॉर्ट पोजिशन (Short Position): “शॉर्ट करना” या “शॉर्ट पोजीशन” एक खास तरह के ट्रेड या सौदे को बताता है। बेचा पहले और खरीदा बाद में।

इस तरह के सौदे ही शॉर्ट ट्रेड या शॉर्ट सौदे कहे जाते हैं।

Moving average is a simple technical analysis indicator used to detect the price trend. In this podcast, we talk about the mo ...

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मूविंग एवरेज का एक सरल प्रयोग ( A simple application of moving averages)

मूविंग एवरेज का उपयोग सही मौके पर स्टॉक को खरीदने और बेचने के लिए किया जा सकता है। जब स्टॉक मूल्य अपने औसत मूल्य से ऊपर ट्रेड करता है, तो इसका मतलब है कि कारोबारी स्टॉक को उसकी औसत कीमत से अधिक कीमत पर खरीदने के लिए तैयार हैं। इसका मतलब यह है कि ट्रेडर को उम्मीद है कि स्टॉक का मूल्य बढेगा। इसलिए ऐसे अवसरों पर खरीदने पर ध्यान देना चाहिए।

इसी तरह, जब स्टॉक मूल्य अपने औसत मूल्य से नीचे ट्रेड करता है, तो इसका मतलब है कि ट्रेडर अपने औसत मूल्य से कम कीमत पर स्टॉक बेचने के लिए तैयार हैं। इसका मतलब है कि ट्रेडर मानते हैं कि स्टॉक की कीमत और नीचे जा सकती है। इसलिए ऐसे में बेचने के अवसरों को देखना चाहिए। इन निष्कर्षों के आधार पर हम एक सरल ट्रेडिंग सिस्टम विकसित कर सकते हैं। एक ट्रेडिंग सिस्टम को नियमों का एक ऐसा समूह माना जा सकता है जो आपको एन्ट्री और एक्जिट के सही समय की पहचान करने में मदद करता है।

अब हम 50 दिन के एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज के आधार पर एक ऐसा ही ट्रेडिंग सिस्टम बनाने की कोशिश करते हैं । याद रखें कि एक अच्छी ट्रेडिंग सिस्टम आपको ट्रेड में एन्ट्री और एक्जिट करने के लिए संकेत देता है। हम निम्नलिखित नियमों के साथ मूविंग एवरेज ट्रेड सिस्टम को विकसित कर सकते हैं:

नियम 1) मौजूदा बाजार मूल्य यानी CMP के 50 दिन EMA से अधिक हो जाने पर खरीदें (लांग करें)। एक बार जब आप लांग करते हैं, तो आपको तब तक निवेशित रहना चाहिए जब तक कि बेचने के नियम की सही स्थिति ना आ जाए।

नियम 2) वर्तमान बाजार मूल्य यानी CMP के 50 दिन EMA से कम होने पर लांग से बाहर निकलें (स्क्वेयर ऑफ करें)।

मूविंग एवरेज के कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं पर ध्यान दिया है:

1. मूविंग एवरेज आपको बिना ट्रेंड वाले (साइडवेज/ sideways) बाजार के दौरान कई ट्रेडिंग सिग्नल (खरीदने और बेचने दोनों के) देता है। इन संकेतों में से अधिकांश मामूली लाभ वाले या नुकसान वाले होते हैं।
2. ,लेकिन आमतौर पर उनमें से एक ट्रेड में से एक एक विशाल रैली (जैसे [email protected] वाला ट्रेड था) के परिणामस्वरूप भारी मुनाफा होता है।
3. कई छोटे ट्रेड से बड़े विजेता ट्रेड को अलग करना बहुत मुश्किल होगा।
4. इसलिए ट्रेडर को उन संकेतों में से मुनाफे वाला ट्रेड चुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वास्तव में, ट्रेडर को उन सभी ट्रेड को करना चाहिए जो सिस्टम सुझा रहा होता है।
5. याद रखें कि मूविंग एवरेज ट्रेड सिस्टम में नुकसान न्यूनतम हैं, लेकिन एक बड़ा ट्रेड सभी नुकसानों की भरपाई के लिए काफी है और आपको पर्याप्त लाभ दे सकता है।
6. मुनाफा कमाने वाले इस ट्रेड में आप तब तक रहते हैं जब तक कि ट्रेंड बना रहे। कभी-कभी कई महीनों तक भी। इस कारण से, मूविंग एवरेज को लांग टर्म निवेश के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
7. मूविंग एवरेज ट्रेडिंग सिस्टम में सफल होने की कुंजी है उन सभी ट्रेड को करना जो कि सिस्टम ने संकेतों में सुझाए हैं, उन पर अलग से विचार करके चुनना गलत होगा।

Here's the recap of key financial highlights of 2019, which shaped the stock market during the year. ...

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Jan
- Trade talks between the US and China concluded without any outcome
- Crude oil price fell from the peak.
- UK Parliament rejects Brexit Deal.

Feb
- Interim Union Budget for 2019–2020 was presented by Piyush Goyal on 1 February 2019.
- RBI cuts benchmark repo rate by 25bps to 6.25% from 6.5% in the first MPC meeting of 2019
- Escalating geo political tension between India and Pakistan after Pulwama terror attack and subsequent retaliation by India
- Market bottoms in third week of February 2019 as opinion polls points to higher chances of incumbent BJP Government returning to power post India’s retaliation after the Pulwama terror attack

March
- Market rallies sharply with the BSE 100 up by 7.2% as FII’s bought equities worth INR 34,000 cr. during the month
- Monthly GST collections have touched all time high of INR 1.06 lakh Cr.
- UK PM Theresa May’s Brexit proposal is rejected by the UK Parliament twice.
- EU agrees to an extension of the Brexit deadline to the 22nd of May 2019.

April
- RBI cuts key repo rate by 25bps for the second time in a row to 6.0%.
- FII flows remained strong for the third month in a row as they were net buyers in Indian equities to the extent of INR 21,193 cr.
- Bank consolidation process started with the merger of Bank of Baroda, Vijaya Bank, Dena Bank.
- IMD warns of delay in monsoon for 2019 due to formation of El Nino over the pacific ocean.

May
- Incumbent BJP comes back to power with an absolute majority which spurs a risk on rally
- GDP growth for Q4FY19 came in below street estimates at 5.8% YoY due to cutback in Government expenditure prior to elections
- US hikes tariffs on USD 200bn worth of Chinese goods to 25% from earlier 10%
- Theresa may announces that she will step down as the leader of the ruling conservative party from the 7th of June 2019.

June
- Major indices like the Sensex and Nifty 50 hit all-time highs by the first week of Jun’19 as the ruling NDA Government returned to power with an even bigger majority than 2014.
- RBI cuts rate for the third time in it’s third bi monthly meeting for CY19 by 25bps in the benchmark repo rate to 5.75% to counter economic slowdown
- Delayed start to the monsoon led to a deficit of ~30% by the end of June 2019.
- China announces hike in import tariffs on US goods worth USD 60bn.

July
- The Government in the Union Budget proposed to increase surcharge on Individuals and trusts earning more than ` 2 cr. and ` 5 cr.
- FII pulled out INR 12,419 cr. during the month due to hike in surcharge in the Union Budget. BSE 100 down by 5.9% for the month.
- The trade war between US and China has escalated further with the US President proposing tariffs of 10% on additional Chinese goods worth USD 300bn.
- US Fed cuts their target rate by 25bps to 2.0-2.25% due to risks caused by the US China trade war
- Monsoon deficit reduced to 9% at the end of July as compared to a deficit of over 30% in end June.

August
- The RBI announced a 35bps rate cut in it’s monetary policy meet and maintained it’s accommodative stance.
- The RBI also accepted the recommendations of the Bimal Jalan committee report and announced a dividend of `1.23lakh cr along with a one-time surplus transfer of `52,640 cr. to the Government.
- The Q1FY20 GDP growth number came at 6 year low of 5.0% due to sharp fall in consumption growth to 3.1%.
- The trade war between US and China escalated further with the US President proposing tariffs on additional Chinese goods worth USD 300bn.
- US Fed announces end of it’s quantitative tightening programme by the end of August 2019.

Sept
- Government cuts Peak corporate tax rates from 30% to 22% and announces concessional tax rate for new domestic manufacturing company at 15%.
- US imposes Tariffs of 15% on Chinese goods worth USD 112bn from the 1st of September 2019.
 US Fed restarts it’s quantitative easing program as it expands its balance sheet by USD 97.8bn in the month of September and also cuts the Fed rate by 25 bps to 1.75-2.0%
- BSE100 closes in the green for the first time in four months, up by 4.0% for the month.

October
- Deadlock on US China trade war continued as both side failed to reach nay deals.
- Impasse over Brexit negotiations continued as the leader of the ruling conservative party failed to push through Brexit deal in UK parliament
- US FOMC cuts the fed target rate by the third time in four months to 25bps on the 30th of Oct to 1.5-1.75% and also expanded its balance sheet by USD 162bn in October.
- UK Parliament approves date for General elections on the 12th of Dec 2019 amidst Brexit deadlock

Nov
- CPI inflation at 4.62% for the month of Oct’19 breaches RBI target of 4.0% as food inflation accelerates to 7.9% due to jump in onion prices.
- FII Flow at INR 25,231 cr. for November 2019 was the second highest in the year after march 2019
- Q2FY20 GDP growth fell further to 4.5%
- High frequency data points like PMI and auto sales numbers point to an improvement in Q3FY20
- UK parliament is dissolved as the country heads for a general elections in December.

Dec
- New on likely US China trade deal fuels global risk on market rally. Nifty touches new all time highs of 12,294.
- Conservative party wins the UK general elections on the 12th of Dec’19 by a wide margin thus ending uncertainties over Brexit.
- Contrary to market expectation RBI does not oblige market with a rate cut on the 6th of Dec’19 and keeps Repo rate at 5.15%.
- CPI inflation at 3 year high of 5.54% in the month of Nov’19 driven by food inflation which stood at 10.0%

For any investor, it becomes imperative that she/he does proper fundamental analysis and study the business carefully. Here, ...

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किसी भी बिज़नेस को समझने के लिए फ़ंडामेंटल एनालिसिस का इस्तेमाल किया जाता है। अगर कोई निवे शक लम्बे समय के लिए बाज़ार में निवेश करना चाहता है तो उसको उस बिज़नेस को ठीक से समझना चाहिए जिसमें निवेश कर रहा है। फ़ंडामेंटल एनालिसिस बिज़नेस को कई तरफ से देखने और समझने के इसी काम में मदद करती है। निवेशक के लिए ये ज़रूरी है कि वो बाजार के हर दिन के शोरगुल से अलग हट कर बिज़नेस के कामकाज पर नज़र डाले। फ़ंडामेंटल तौर पर मज़बूत कं पनियों के शेयर की क़ीमत समय के साथ बढ़ती है और निवेशक को फ़ायदा होता है।

भारतीय बाज़ार में ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे इनफ़ोसिस, TCS, पेज इंडस्ट्री, आयशर मोटर्स, बॉश इंडिया, नेस्ले इंडिया, TTK प्रेस्टीज आदि। इनमें से हर कंपनी ने दस साल से ज़्यादा तक औसतन 20% से ज़्यादा का कम्पाउंड वार्षिक रिटर्न (CAGR) दिया है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि इनमें पैसा लगाने वाले हर नि वेशक का पैसा 3.5 साल में दोगुना हो रहा था। CAGR रिटर्न जितना ज़्यादा होगा आपकी पूँजी उतनी ही तेज़ी से बढ़ेगी। बॉश इंडिया जैसी कुछ कंपनियों ने तो 30% तक का CAGR दिया है। तो अब आपको स मझ आ गया होगा कि फ़ंडामेंटल तौर पर मज़बूत कंपनियों में निवेश करके कितनी तेज़ी से और कितना ज़्या दा पैसा कमाया जा सकता है।

क्या मैं फ़ंडामेंटल एनालिस्ट बन सकता हूँ?

आप बिलकुल बन सकते हैं। ये एक ग़लतफ़हमी है कि सिर्फ़ चार्टर्ड अकाउंटंट या कॉमर्स के बैकग्राउंड वाले लोग ही अच्छे फ़ंडामेंटल एनालिस्ट बन सकते हैं। एक अ च्छा फ़ंडामेंटल एनालिस्ट बनने के लिए आपको बस कुछ चीज़ें सीखनी होंगी।:

1. वित्तीय स्टेटमेंट को समझना
2. हर बिज़नेस को उसकी इंडस्ट्री के परिप्रेक्ष्य के साथ समझना होगा
3. ज़रूरी गणित को जानना होगा

फंडामेंटल एनालिसिस के टूल्स यानी उपकरण

फंडामेंटल एनालिसिस के लिए इस्तेमाल की जाने वाले टूल्स बहुत ही साधारण होते हैं जो कि सबके लिए मुफ्त में उपलब्ध हैं। इसके लिए आपको चाहिए:
1. कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट – फंडामेंटल एनालिसिस के लिए आपको जो भी सूचनाएं चाहिए वह कंपनी की एनुअल रिपोर्ट यानी वार्षिक रिपोर्ट में होती हैं आप इसे कंपनी के वेबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं।
2. इंडस्ट्री से जुड़ा डेटा– यह जानने के लिए कि कंपनी कैसा काम कर रही है आपको इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ डेटा भी चाहिए। यह डेटा भी मुफ्त उपलब्ध होता है। इसके लिए आपको उस इंडस्ट्री एसोसिएशन यानी संगठन की वेबसाइट पर जाना होता है।
3. समाचार या खबरों पर नज़र– हर दिन की खबर आपको कंपनी के बारे में, इंडस्ट्री के बारे में और अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी देती रहती है। एक अच्छा समाचार पत्र या न्यूज़ चैनल आपके लिए काम आ सकता है।
4. माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल (MS Excel) – हालांकि ये मुफ्त नहीं है लेकिन यह आपके फंडामेंटल एनालिसिस की गणनाओं के लिए काफी जरूरी है।

इन चार टूल्स यानी उपकरण की मदद से आप फंडामेंटल एनालिसिस कर सकते हैं और यह किसी भी दूसरे फंडामेंटल एनालिस्ट की एनालिसिस के मुकाबले कम नहीं होगा। बड़ी-बड़ी कंपनियों के रिसर्च डिपार्टमेंट भी ऐसे ही काम करते हैं और उनकी भी कोशिश होती है कि उनकी रिसर्च सीधी सरल और तर्कसंगत हो।

If you are just entering the stock market or looking to move away from fixed deposits, this podcast is for you. Here, we have ...

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First step:
This is a conversation between a theatre actress (Amita) and her make up man (Devesh). They are both sitting in the green room. The actress notices injury marks on her make up man’s face and enquire about the same.

Amita: Arry Devesh, tumhare face be kya hua yeh? Chot kaise lagi?

Devesh: Kya batao madam, biwi ne maara. Itni mehnat karke bhi poora nahi padta uska pet. Bolti hai ghar chalaane ke liye aur paisa chahiye. Ab bataao, subah se shaam tak aapki naukri karta hun. Kahan se kamaa ke laaon aur paisa?

Amita: Pagal yeh problem chal rahi hai tumhare ghar mein, pehle bataana chaahiye tha na. Share market mein part time trading kyun nahi karte?

Devesh: Madam, shares bole toh???

Amita: Seedhi bhaasha mein, Shares bole toh small ownership piece of the company and is also called a stock or scrip.

A company issues shares by selling them to the general public through an Initial Public Offering or IPO. Once these shares have been sold, investors (or traders) can trade these stocks amongst themselves.

Devesh: You used the word IPO. What’s that? Is it similar to primary market? A friend mentioned it to me.

Amita: When a company introduces share sale for the first time, it is called IPO. Here, you are buying directly from the company issuing the shares.

However, there could be a case that your luck runs out and you are not allotted any share during an IPO (could happen because of huge demand and limited supply).

If you are still confident about the company, you can buy the same stock from the secondary market.
Bhuljo naa, jo shares bya market ma trade ta thyan, hue peron IPO thi kare peno market mein inda ayin.
Devesh: Trade through secondary market???

Amita: Secondary market manjhe stock exchange bhau! Basically a company can’t go door to door asking people if they want to buy or sell shares. Which is why a centralised market place is created in each country, which in India’s case is Bombay Stock Exchange or BSE (Asia’s oldest stock exchange) and National Stock Exchange or NSE (established in 1994).

It’s been observed over the years that NSE is more popular and see larger volume as compared to BSE. However, you can trade on any platform you like.

Before we move further, let us understand the market indices as well. The first is BSE Sensex, which is the weighted average of prices of 30 select stocks listed on the Bombay Stock Exchange. The weights are the market caps of the individual stocks.

Similarly NIFTY 50 is the weighted average of prices of 50 select stocks listed on the National Stock Exchange.

So next time you hear Sensex falls 500 points or NIFTY is down by 50 points, you know that the prices of certain stocks have fallen.

Devesh: But why do prices fall? Why can’t they just go up and up?

Amita: Wrong question at the right time, bidhu! Remember, last year onion was selling at Rs 100/kg and this year at Rs 20/kg. Why? Because last year the demand was high and supply was low while this year supply is in excess so the prices have fallen.

Similarly, stock prices fluctuate because of demand and supply imbalance. This imbalance is caused by various factors such as economy, concerned sector, company events etc. These imbalances make the investors reassess their expectations of the company profitability and hence make them either buy/sell.

Devesh: Hmmm...Now I think I am ready to go to NSE building and start trading.

Amita: Dada, etah cholbe naa! Just as you approach a broker for buying or renting a house, you have to approach a stock broker to open a demat account for you and only through that account, you will be able to transact in a stock.

To simplify, you can think of these brokers are licensed members of BSE or NSE. They are duly registered with the exchanges and act only as a mediator.

Whatever you buy or sell, they collect the money and deposit with the exchanges. For facilitating all these transactions, they charge a basic fee from you.

Devesh: Can you throw some more light on demat account?

Amita: Just like you open a bank account for all your financial transactions, stocks are traded through a demat account which you can open with any broker. Pricing, transaction charges etc vary from broker to broker. Which is why, do your research properly before opting for a stock broker (By the way, you can also check out our free course on how to choose a stock broker). The demat account is linked to your bank account. Toh bas, paise transfer karo aur utar jaao market mein (marwadi).

Devesh: Listen, it may sound cheap to you but still I would ask. What if I don’t have money and still want to buy a stock? Do these brokers also have a overdraft facility just like my bank?

Amita: Yes, that facility is there. Suppose you buy a stock today, the settlement happens in T+2 days (two days after the day you have placed the trade). Some brokers extend this to T+5, which means you can buy stocks with minimum margin money and pay up the entire amount in the next five days. Still need a reason to jump in the market?

Devesh: Lekin market mein utar ke karun kya?

Amita: Ippudu miru anni tigalapai kottaru!! Once you have a demat account in place, you can either buy a stock for a short term (even for 5 minutes) or for long term (say 50 years provided the company survives till then).

Buy at X and sell at 2X, simple. Even to do that, you need to be sure about the stocks bro. The company, management, profits, products, market share, you need to learn all about these before you actually buy a stock.

Seems difficult? It is but I am sure you would put in some efforts to protect your hard earned money.

Devesh: And how would I decide whether I have to trade or invest?

Amita: Simple hai naa! Invest for long term if you are looking for dividend as well as price appreciation. Take a position for couple of days if you are looking for price appreciation across days.

And mota bhai, tamey ek divas maa paisa banava maango cho, toh become a day trader. Devesh: Price appreciation is clear to me but what’s dividend?

Amita: Ooppsss! Sorry I missed that bit. Woh kahawaat suni hai naa, “Aam ke aam, guthliyo ke daam”! When you buy a stock, you become a part owner in the company and hence as and when a company earns handsome profits, it distributes a part of it to shareholder as dividend. If profits are low or negative, the company might not pay dividend.

Devesh: Dude, profits can be negative also, really? I am screwed if that happens!

Amita: Ama Anna, iduku dan vidham vidham ah stocks lah invest pannanum. For example if you have Rs 50,000, you can either choose to invest in one company or spread your risk by investing in couple of companies. The benefit is that even if company does not perform, others will take care of your portfolio.

This diversification would depend entirely on the returns you want and the risk you are willing to take for the same. And, you might get lucky if it’s a bull market!

Devesh: Ab bull kaha se aa gaya share market?

Amita: Kaha se aaya woh toh pataa nahi but since ages, a bull is only driving a positive market while a bad market is pulled down by a bear. If someone says market looks bullish for next week, it means it looks good. While a bearish trend means market is going to go down.

Devesh: This means I would be able to make money on every transaction during bullish market?

Amita: Paaji pher tey phatte chakk diyaange! And if you do that, don’t forget to call Warren Buffet and offer some tips to him as well since even he could not achieve 100% success rate. Otherwise, just remember one thing that irrespective of market condition, not 10 out of 10 transactions will make you money. Probably 6 out of them would do. But make sure that these 6 should take care of the losses you suffered on the other 4.

Devesh: So I have to keep a track on entire gamut of world news to ensure that I do not lose money?

Amita: Naah naah. Remember the dudes who are opening your demat accounts? Apart from all the services they provide you, a lot of them offer research reports which tell you about the stocks, sectors and major financial events. Why do they do that? Because they will make money only if you are making money!

Devesh: What all can be traded on stock exchanges apart from stocks?

Amita: Well, stocks comprise of what you call equity. The other things that you can trade in are derivatives, commodities and currencies.

Devesh: Wait...wait...wait. I tried buying a stock sometime back but it asked me to fill whether market order or limit order.

Amita: As you start buying the stock, you fill in quantity and then it asks you whether you have a price in mind for the stock or you want to buy at the current market price. So if you have an idea about the price, select Limit and add your price. Else, trust market and select Market order. And your order would be placed at the current market price. And since we are talking about placing order, do not forget to also state your stop-loss order (for traders only) which gets activated only when the price of the relevant share reaches a threshold price specified by the investor in the form of 'Stop Loss Trigger Price' (SLTP). Once the price of the stock surpasses the SLTP, the order becomes activated and then on behaves as a normal limit order.

Devesh: Yuppie, now I will buy/sell all day long!

Amita: You won’t be able to do that my friend because Indian exchanges allow you to trade or invest only between 9:15am to 3:30pm. You can pre-order a stock starting 9am. Lekin pre-order karogey kaise? Kaun sa stock lena hai, decide kar liya? Good if you have decided on the same. If not, here’s a course for you on How to scan stocks! After all, Padhega India tabhi toh Invest Karega India!!!

In this podcast, we explain the different technical charts traders can use to identify trading opportunities in the stock mar ...

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1. लाइन चार्ट
2. बार चार्ट
3. जापानी कैंडलस्टिक

लाइन और बार चार्ट

लाइन चार्ट सबसे सीधा और आसान चार्ट होता है। इसमें केवल एक डाटा प्वाइंट होता है और उसी पर यह चार्ट तैयार किया जाता है। टेक्निकल एनालिसिस में सिर्फ एक चीज के लिए लाइन चार्ट बनाया जाता है– क्लोजिंग प्राइस को लेकर। ये चार्ट शेयर का भी हो सकता है और इंडेक्स का भी। हर दिन के क्लोजिंग प्राइस के लिए एक चार्ट पर एक बिंदु बनाया जाता है और उसके बाद उन सारे बिंदुओं को एक लाइन से जोड़ दिया जाता है जिससे लाइन चार्ट बन जाता है।

अगर आप 60 दिन का डाटा देख रहे हैं तो उन सारे दिनों के क्लोजिंग प्राइस को जोड़कर एक लाइन खींची जाती है और लाइन चार्ट बन जाता है।

लाइन चार्ट अलग अलग समय सीमा के लिए बनाया जा सकता है जैसे महीने का लाइन चार्ट, हफ्ते का लाइन चार्ट, घंटे का लाइन चार्ट आदि। अगर आप सप्ताह का लाइन चार्ट बनाना चाहते हैं तो आप तो सप्ताह के क्लोजिंग प्राइस को एक चार्ट पर डालना होगा और उनको लाइन से जोड़ना होगा।

लाइन चार्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है यह बहुत ही सीधा और सरल होता है। कोई भी ट्रेडर इसको देख कर एक ट्रेंड का पता लगा सकता है। लेकिन इसका सीधा और सरल होना ही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। लाइन चार्ट सिर्फ एक ट्रेंड बता सकता है और कुछ नहीं। इसके अलावा लाइन चार्ट की दूसरी कमजोरी यह है कि यह सिर्फ क्लोजिंग कीमत के आधार पर बनाया जाता है और दूसरे डाटा प्वाइंट जैसे ओपन हाई और लो पर ध्यान नहीं देता। इसलिए ट्रेडर लाइन चार्ट का इस्तेमाल ज्यादा नहीं करते।

बार चार्ट में लाइन चार्ट के मुकाबले कुछ ज्यादा डाटा डाला जा सकता है। जैसे OHLC चारों को इसमें दिखा सकते हैं। एक बार चार्ट के तीन हिस्से होते हैं।

1. सेन्ट्रल लाइन (Central Line)- बार का सबसे ऊँचा हिस्सा सबसे ऊँची कीमत यानी हाई (High) को दिखाता है जबकि बार का नीचे का हिस्सा सबसे निचली कीमत यानी लो (Low) को बताता है।
2. बाँया मार्क/ टिक (The left mark/Tick)- ये ओपन (O) यानी खुलने के समय वाली कीमत बताता है।
3. दाहिना मार्क/ टिक (The right mark/Tick)- ये क्लोज (C) यानी बंद कीमत दिखाता है।

हालांकि बार चार्ट चारों डाटा प्वाइंट दिखाता है लेकिन फिर भी यह देखने में बहुत अच्छा नहीं होता। यह बार चार्ट की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसको देखकर आसानी से किसी पैटर्न का पता लगाना थोड़ा मुश्किल दिखता है, खासकर तब जब आपको दिन में कई चार्ट देखने हों। इसीलिए ट्रेडर बार चार्ट का इस्तेमाल कम करते हैं। लेकिन अगर आप बाजार में नए हैं तो हमारी सलाह यह होगी कि आप जापानी कैंडलस्टिक का इस्तेमाल करें। बाजार के ज्यादातर ट्रेडर्स कैंडलस्टिक का ही इस्तेमाल करते हैं।

जापानी कैंडलस्टिक का इतिहास

आगे बढ़ने से पहले जापानी कैंडलस्टिक का इतिहास जान लेना अच्छा होगा। नाम से आपको पता ही चल गया होगा कि कैंडलस्टिक की उत्पत्ति जापान में हुई थी। इसका पहला इस्तेमाल 18वीं सदी में जापान में एक चावल के व्यापारी ने किया था। हालांकि जापान में कीमतों की एनालिसिस करने के लिए इसका इस्तेमाल काफी पहले से हो रहा है, लेकिन पश्चिमी देशों को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। यह माना जाता है कि 1980 में एक स्टीव निशन (Steve Nison) नाम के एक ट्रेडर ने इसे पाया और फिर दुनिया को इसका उपयोग और इसके काम का तरीका बताया। उसने इस पर एक किताब भी लिखी– “ जैपनीज कैन्डलस्टिक चार्टिंग टेक्निक्स (Japanese Candlestick Charting Techniques)”।अभी भी ये किताब काफी लोकप्रिय है।

कैंडलस्टिक की संरचना

बार चार्ट में ओपन और क्लोज कीमतें टिक या मार्क के तौर पर दिखाई जाती हैं जो कि बाएं या दाएं ओर होती हैं। जबकि कैंडलस्टिक में ओपन और क्लोज कीमतें एक चौकोर आयत यानी रेक्टैंगल (Rectangle) के तौर पर दिखाई जाती हैं। कैंडलेस्टिक चार्ट में बेयरिश कैंडल यानी मंदी की कैंडल और तेजी की कैंडल यानी बुलिश कैंडल दोनों होती हैं। बुलिश कैंडल नीले हरे या सफेद और बेयरिश कैंडल लाल या काले कैंडल के तौर पर दिखाई जाती हैं। वैसे आप इन रंगों को कभी भी बदल सकते हैं और अपने पसंद के रंग डाल सकते हैं। टेक्निकल एनालिसिस का सॉफ्टवेयर आपको रंग बदलने की सुविधा देता है।

सबसे पहले बुलिश कैंडल को देखते हैं। बार चार्ट की तरह ही कैंडल शेप में तीन हिस्से होते हैं।

1. सेन्ट्रल रीयल बॉडी (The Central real body)– मुख्य हिस्सा जो कि आयताकार यानी रेक्टैंगुलर (Rectangular) होता है और ओपन और क्लोज कीमत को जोड़ता है।

2. अपर शैडो (Upper Shadow) यानी ऊपरी शैडो– हाई (सबसे ऊँची कीमत) को क्लोज कीमत से जोड़ता है।

3. लोअर शैडो (Lower Shadow) यानी नीचे का शैडो– लो (सबसे निचली कीमत) को ओपन कीमत से जोड़ता है।

इसी तरह बेयरिश कैंडल (Bearish candle) में भी तीन हिस्से होते हैं।

1. सेन्ट्रल बाडी (Central body) – आयताकार मुख्य बॉडी जो ओपन और क्लोज कीमत को जोड़ती है। हालांकि ओपनिंग ऊपर की तरफ और क्लोजिंग रेक्टैंगल के नीचे की तरफ होता है।
2. अपर शैडो (Upper shadow)यानी ऊपर का शैडो– हाई प्वाइंट (high point) को ओपन (open) से जोड़ता है।
3. लोअर शैडो (Lower shadow) यानी नीचे का शैडो– लो प्वाइंट (low point) को क्लोज (close) यानी बंद से जोड़ता है।
समय अवधि/समयावधि या टाइम फ्रेम (Time Frame) उसको कहते हैं जिस समय के लिए आप चार्ट को देखना चाहते हैं। कुछ लोकप्रिय टाइम फ्रेम या समयावधि हैं;

o मासिक या मंथली चार्ट
o साप्ताहिक या वीकली चार्ट
o दिन का या डेली चार्ट
o इंट्रा डे चार्ट – 30 मिनट, 15 मिनट और 5 मिनट

समय अवधि में अपनी जरूरत के मुताबिक फेर बदल किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक ट्रेडर 1 मिनट का चार्ट भी देख सकता है अगर उसे जल्दी-जल्दी सौदे करने हों तो।

In this podcast, we decode a few basic option jargon which will not only strengthen your learning but will also smoothen your ...

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Basic options jargons

Here are a few jargons that we will look into –

1. Strike Price
2. Underlying Price
3. Exercising of an option contract
4. Option Expiry
5. Option Premium

Consider the strike price as the anchor price at which the two parties (buyer and seller) agree to enter into an options agreement. For all ‘Call’ options the strike price represents the price at which the stock can be bought on the expiry day. For example, if the buyer is willing to buy Tata Motors Call Option of Rs.180 (180 being the strike price) then it indicates that the buyer is willing to pay a premium today to buy the rights of ‘buying Tata motors at Rs.180 on expiry’. Needless to say he will buy Tata Motors at Rs. 180 only if Tata motors is trading above Rs.180.

Underlying price

As we know, a derivative contract derives its value from an underlying asset. The underlying price is the price at which the underlying asset trades in the spot market. For a call option, the underlying price has to increase for the buyer of the call option to benefit.

Exercising of an option contract

Exercising of an option contract is the act of claiming your right to buy the options contract at the end of the expiry. If you ever hear the line “exercise the option contract” in the context of a call option, it simply means that one is claiming the right to buy the stock at the agreed strike price. Clearly he or she would do it only if the stock is trading above the strike. Here is an important point to note – you can exercise the option only on the day of the expiry and not anytime before the expiry. Hence, assume with 15 days to expiry one buys FDC 260 Call option when FDC is trading at 230 in the spot market. Further assume, after he buys the 260 call option, the stock price increases to 290 the very next day. Under such a scenario, the option buyer cannot ask for a settlement (he cannot exercise) against the call option he holds. Settlement will happen only on the day of the expiry, based on the price the asset is trading in the spot market on the expiry day.

Option expiry

Similar to a futures contract, options contract also has expiry. In fact both equity futures and option contracts expire on the last Thursday of every month. Just like futures contracts, option contracts also have the concept of current month, mid month, and far month.

Option premium

Premium is the money required to be paid by the option buyer to the option seller/writer. Against the payment of premium, the option buyer buys the right to exercise his desire to buy (or sell in case of put options) the asset at the strike price upon expiry.

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