स्टॉक निवेश को एक मजबूत जोखिम-रिटर्न सहसंबंध की विशेषता से वर्गीकृत किया जाता है। उच्च जोखिम का मतलब अधिक से अधिक रिटर्न और इसके विपरीत है। जोखिम प्रबंधन संभावित जोखिम को पहचानने और मूल्यांकन करने और अधिकतम संभव रिटर्न अर्जित करने के लिए रणनीतियों को विकसित करने का कार्य है।

जोखिम प्रबंधन रणनीतियाँ

बाजार की प्रवृत्तियों का अनुसरण करना:

बहुत से निवेशकों का मानना है कि बाजार की प्रवृत्तियों के खिलाफ निवेश करने से उन्हें उच्च रिटर्न मिल सकता है। हालांकि, प्रवृत्तियों का अनुसरण करके निवेश जोखिम को कम करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शेयर बाजार रणनीतियों में से एक है। इस रणनीति में परेशानी प्रवृत्ति की पहचान कर पाना है क्योंकि बाजार गतिशील हैं और लगातार बदल रहे हैं। लंबी अवधि के भीतर अल्पकालिक प्रवृत्ति को समझ पाने में सक्षम होना एक मुश्किल काम है।

विविधीकरण निवेश पोर्टफोलियो:

भारतीय शेयर बाजार निवेशकों को इक्विटी, बॉन्ड, डेरिवेटिव और म्यूचुअल फंड जैसे कई वित्तीय उत्पाद प्रदान करता है। निवेशक अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने के लिए इन वित्तीय साधनों में से एक से अधिक का चयन कर सकते हैं। इसके आगे विविधीकरण अलग-अलग क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न कंपनियों द्वारा पेश किए गए वित्तीय उत्पादों को शामिल करके  प्राप्त किया जा सकता है। यह निवेश से प्राप्त समग्र रिटर्न की बाजार में उतार-चढ़ाव से रक्षा करता है और यदि कोई विशिष्ट क्षेत्र या कंपनी एक प्रतिकूल तरीके से चलती है, तो पोर्टफोलियो में अन्य निवेश निवेशकों के पोर्टफोलियो के भीतर संतुलन प्राप्त कर सकते हैं।

धीरज रखना और त्वरित निर्णय से बचना:

कई निवेशक अपने निवेश की कीमत में हर छोटे संचलन के साथ त्वरित और जल्दबाज निर्णय लेते हैं। इसके अलावा, एक और स्टॉक मार्केट टिप जिनका पालन करना निवेशक भूल जाता है, वह है अपने शेयर बाजार निवेश निर्णय लेने से पहले स्वयं शोध और उचित परिश्रम करने का समय लेना। निवेश करने से पहले वित्तीय उद्देश्यों का निर्धारण करना और अल्पकालिक और दीर्घकालिक उद्देश्यों दोनों पर ध्यान केंद्रित करने से निवेशकों को अपने शेयर बाजार के निवेश पर अधिकतम लाभ का आनंद लेने में मदद मिलेगी।

कारोबारों की योजना बनाना:

योजना और रणनीति का विकास युद्ध जीतने में मदद करता है।भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने के लिए भी यह सच है। पहले से योजना बनाना स्टॉक निवेश के माध्यम से सफलता और विफलता के बीच सारे अंतर कर सकता है। कारोबार की योजना बनाने में स्टॉप-लॉस और टेक-प्रॉफिट पॉइंट्स का उपयोग उपयोगी उपकरण हैं। सफल निवेशक इन मूल्य स्तरों को स्पर्श करने वाले शेयरों की क्षमता के खिलाफ संभावित रिटर्न की गणना करने के लिए प्रवेश और निकास मूल्य स्तर को पूर्व-निर्धारित करते हैं। दूसरी ओर, असफल व्यापारी उन कीमतों पर विचार किए बिना निवेश करते हैं जिन पर वे वित्तीय साधनों को खरीदेंगे और बेचेंगे। वे अक्सर भावनाओं के साथ व्यापार करते हैं; जब भी कीमत कम हो जाती है, तो बदलाव की आशा में, अपनी स्थितियों को होल्ड किए रखते हैं और कीमतें बढ़ने पर और भी उच्च लाभ बनाने के लालच में लाभ बुक करने में असफल हो जाते हैं।

स्टॉप-लॉस:

यह सबसे कम कीमत है जिस पर निवेशक बेचने के लिए तथा आगे की हानि से बचने के लिए तैयार है। जब बाजार निवेशक अपेक्षाओं के अनुसार नहीं चलता है, स्टॉप-लॉस पॉइंट सेट करना उपयोगी होता है ।यह ‘मूल्य वापस आ जाएगा’ की मानसिकता को रोकने और निवेश पर नुकसान को सीमित करने में फायदेमंद है।

टेक- प्रॉफिट:

यह वह कीमत है जिस पर निवेशक अपने निवेश बेचने तथा लाभ बुक करने के लिए लिए तैयार है। जब आगे की कीमत में वृद्धि की संभावना बहुत अधिक हो तो यह बिंदु जोखिम को कम करने के लिए फायदेमंद है। बड़े लाभ के बाद अपने प्रतिरोध के स्तर के पास आ रहे शेयरों पर लाभ बुक करना यह सुनिश्चित करता है कि निवेशकों इन्हें समेकन और कीमतों में कमी शुरू से पूर्व बेच रहे हैं।

शेयर बाजार जोखिम भरा है और स्मार्ट निवेशक इसे कम करने के लिए जोखिम प्रबंधन रणनीतियों का लाभ उठाते हैं। विभिन्न जोखिम शमन उपकरणों का सावधानीपूर्वक और समय पर उपयोग सुनिश्चित करता है कि निवेशक स्टॉक निवेश के माध्यम से लाभ को अधिकतम कर सकते हैं।