What is Intrinsic value? How to find it? | Hindi

Podcast Duration: 07:40

हाई दोस्तो! एंजेल ब्रोकिंग के इस पॉडकास्ट में आपका स्वागत है! मैंने हाल ही में एक हाई स्कूल के टीचर को टीनेजर्स की एक क्लास को समझाते हुए एक वीडियो देखा, कि लोकडॉउन में हो सकता है आपके माता-पिता आपको नहीं बताएं, लेकिन सभी पर फाइनेंशियल प्रेशर बढ़ गया है। “हम सभी को इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टेशनरी और कपड़े जैसी नई चीजों की जरूरत है लेकिन प्लीज अभी ब्रांड के पीछे मत पड़ो - कम से कम इन चुनौतीपूर्ण फाइनेंशियल समय के दौरान, असली वैल्यू के हिसाब से खर्च करना। घर पर बैठे आपको वास्तव में अपनी वर्चुअल क्लासेस के लिए 2,000 रुपये की टी-शर्ट पहनने की आवश्यकता नहीं है। टी-शर्ट तो टी-शर्ट ही रहता है… आप 250 रुपये दें या 650 रुपये या 2,500 रुपये, टी-शर्ट की कीमत उतनी ही रहती है, तो कीमत के हिसाब से खरीद लो बजाय लोकप्रियता, ब्रांड आदि के। लॉकडॉउन हो या ना हो, कोविड हो या ना हो स्टॉक मार्केट में जरूर स्टॉक्स को कीमत(वर्थ) के हिसाब से खरीदना चाहिए। ये "एक्चुअल वर्थ" को "इंट्रिन्सिक वैल्यू" कहा जाता है। तो वास्तव में इंट्रिन्सिक वैल्यू क्या है? चलिए समझते हैं! इंट्रिन्सिक वैल्यू, जिसे कभी-कभी रीयल वैल्यू भी कहा जाता है, कंपनी के स्टॉक की एक्चुअल वैल्यू को कैलकुलेट करता है। इंट्रिन्सिक वैल्यू कांसेप्ट में पहली धारणा यह है की स्टॉक मार्केट लॉजिकल तरह से व्यवहार नहीं करता है। स्टॉक का वास्तविक मूल्य A हो सकता है लेकिन स्टॉक मार्केट में यह A से कम या A से अधिक या A माइनस 50 रुपये या A मल्टीप्लाई 50 हो सकता है।ये तो सही बात है क्योंकि स्टॉक मार्केट में डिमांड सप्लाई इकोनॉमिक्स भी खेलती है। वास्तव में हज़ारो फ़ैक्टर्स से स्टॉक की कीमत में उतार-चढ़ाव होता है। तो पहली बात जो आपको इंट्रिन्सिक वैल्यू के बारे में समझने की है वह यह है कि यह करंट स्टॉक प्राइस को वैल्यू का रीयल इंडिकेटर नहीं मानती है। इंट्रिन्सिक वैल्यू के बारे में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पॉइंट है कि इंट्रिन्सिक वैल्यू कैलकुलेट करने के कई सारे तरीके हैं। अलग अलग फाइनेंशियल एनालिस्ट अलग अलग तरीके काम में लेते हैं। आज के पॉडकास्ट में हम इंट्रिन्सिक वैल्यू कैलकुलेट करने के लिए काम लिए जाने वाले कुछ आम तरीके देखेंगे। इससे पहले, आप शायद सोच रहे होंगे - स्टॉक तो स्टॉक मार्केट प्राइस पर ख़रीदना है। वास्तविक मूल्य(एक्चुअल वैल्यू) कैलकुलेट करने का क्या मतलब है? जब किराने का सामान ख़रीदने जाते हो तो आप किराने के सामान के बाजार मूल्य का भुगतान करते हैं, है ना? आप बैठकर कैलकुलेट नहीं करते कि मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट क्या थी…. आसान सी बात है दोस्त। आप स्टॉक की इंट्रिन्सिक वैल्यू से अधिक नहीं देना चाहते हैं। यदि स्टॉक बढ़ी हुई कीमत पर ट्रेड कर रहा है, जो कि उसके कैश फ्लो और फाइनेंशियल से नहीं मिलती है, तो फिर स्टॉक प्राइस सुधार - जिसका अर्थ है स्टॉक प्राइस में गिरावट - होने की बड़ी संभावना है। इसका मतलब है कि आप एक बढ़ी हुई कीमत पर खरीदेंगे और जब स्टॉक आपके पास है तो उस समय कीमत गिर सकती है। ये तो स्मार्ट इन्वेस्टिंग का बिलकुल विपरीत है। आप तब खरीदना चाहते हैं जब स्टॉक की वैल्यू कम हो या कम से कम कीमत या उचित वैल्यू पर हो- ताकि स्टॉक की कीमत बढ़ने के लिए जगह हो और कीमत अधिक होने पर स्टॉक को बेचकर कुछ कमा सकें। वैल्यू इन्वेस्टर्स विशेष रूप से, स्टॉक की इंट्रिन्सिक वैल्यू पर नजर रखते हैं। वैल्यू इन्वेस्टिंग स्ट्रेटेजी में आईडीया केवल उन स्टॉक्स को खरीदना है जो डिस्काउंट पर हैं, या उनकी एक्चुअल वैल्यू से नीचे ट्रेड कर रहे हैं। अब जब आप इंट्रिन्सिक वैल्यू का अर्थ और आपको किसी स्टॉक की इंट्रिन्सिक वैल्यू क्यों कैलकुलेट करनी चाहिए समझ गए हैं, तो दो सबसे लोकप्रिय कैलकुलेशन के तरीकों को समझते हैं। क्वालिटेटिव मॉडलइस मॉडल में फाइनेंशियल एनालिस्ट सारे फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट को देख कर स्टॉक का रीयल वैल्यू कैलकुलेट करते हैं। फाइनेंशियल एनालिस्ट कंपनी के बिजनेस के विभिन्न पहलुओं को महत्व देंगे। फाइनेंसियल स्टेटमेंट्स के अलावा, फाइनेंशियल एनालिस्ट इन्वेस्टर के दृष्टिकोण पर भी विचार करते हैं, कंपनी की टारगेट ऑडियंस , मैनेजमेंट टीम - बहुत सारी चीजों पर विचार किया जाता है। फाइनेंसियल एनालिस्ट की परेशानी यह है कि विषयवस्तु निर्णय लेने(सब्जेक्टिविटी डिसिशन मेकिंग) में कभी नहीं आना चाहिए। मैथमेटिकल मॉडल विकसित कर के, फाइनेंसियल एनालिस्ट अपनी राय और भावनाओं और पिछले अनुभवों को इक्वेशन से बाहर रखने की कोशिश करते हैं।हालांकि, कुछ इन्वेस्टर्स क्वालिटेटिव मॉडल पसंद करते हैं क्योंकि; यह केवल हार्ड नंबर्स के अलावा कंपनी चलाने वाले लोगों पर भी विचार करता है (या यदि आप स्टॉक खरीदते हैं तो आपके पैसे के साथ चलता है)।डिस्काउंटेड कैश फ्लो मॉडलसब्जेक्टिविटी को खत्म करने और पूरी तरह से नंबर्स पर भरोसा करने के मामले में ये मॉडल थोड़ा आसान है। डीसीएफ मॉडल में कंपनी का कैश फ्लो और डब्ल्यूएसीसी, मतलब वेटेड एवरेज कॉस्ट ऑफ़ कैपिटल काम लिया जाता है।आइए डीसीएफ मॉडल को समझने के लिए इन दो शब्दों को समझते हैं! जैसा कि आपको पता होगा कैश फ्लो से मतलब है कि पैसा एक कंपनी में आ रहा है और बाहर जा रहा है (जिससे पता चलता है कि बिजनेस अच्छी तरह से चल रहा है कि नहीं)डब्ल्यूएसीसी थोड़ा अधिक जटिल है - यह उस कैपिटल अमाउंट को दर्शाता है जो एक कंपनी भविष्य में अर्न करने की उम्मीद रखती है।फॉर्मूला तो ज्यादा ही कठिन है। यह कुछ इस तरह दिखेगा। हम इसे आसान बनाने के लिए कुछ शार्ट फॉर्म्स काम में लेंगे - CF का मतलब है कॅश फ्लो और R का मतलब है इंटरेस्ट रेटइंट्रिन्सिक वैल्यू = (CF1) को (1 + r) + (CF2) से डिवाइड करके (1 + r)^2 + (CF3) के स्क्वायर से डिवाइड करके (1 + r) के क्यूब से डिवाइड किया जाता है एंड सो ऑन। एक बार जब आपको अपनी इंट्रीसिक वैल्यू मिल जाती है, तो आपको इसकी तुलना एक्चुअल स्टॉक प्राइस से करनी चाहिए। अगर स्टॉक प्राइस इंट्रिन्सिक वैल्यू से कम है तो स्टॉक की कीमत अंडरवैल्यूड है। अगर स्टॉक की कीमत इंट्रिन्सिक वैल्यू से ज्यादा है, तो स्टॉक की कीमत ओवरवैल्यूड है, या इसकी कीमत बढ़ गई है।तो आज के पॉडकास्ट में बस इतना ही। अब मैं भी जाती हूं कुछ स्टॉक की इंट्रिन्सिक वैल्यू को कैलकुलेट करना है-मिलते हैं अगली बार। तब तक के लिए, एंजेल ब्रोकिंग से अलविदा, और हैप्पी इन्वेस्टिंग!इन्वेस्टमेंट और सिक्योरिटी मार्केट जोखिमों के अधीन हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ें।