Leverage some of the top financial strategies to increase your wealth | Hindi

Podcast Duration: 06:38

दोस्तों। एंजेल ब्रोकिंग के इस पॉडकास्ट में आपका स्वागत है।दोस्तों इस्स पॉडकास्ट में हम बात करेगें आर्थिक उपायों जो आपको ध्यान में रखने चाहिए अपनी संपत्ति बढ़ाने के लिए। सच इस पर तो पूरी एक बुक लिखी जा सकती है, क्योंकि बहुत सारी संपत्ति बढ़ाने के उपाए होते हैं, पर उनमें से कुछ बहुत कॉमन और आसानी से की जाने वाले उपाए हैं जिन पर आपको ज़रूर सोचना चाहिए। मूल्य निवेश- मूल्य निवेश शेयर बाज़ार का सबसे प्रसिद्ध निवेश का तरीका है, जिसमें निवेशक डिस्काउंट या कम कीमत केस्टॉक खरीद लेते हैं। शेयर बाज़ार में शेयर के दाम हमेशा उचित नहीं रहते। किसी घाटे में जा रही कंपनी का स्टॉक महंगा हो सकता है कुछ हथकंडों या मांग और आपूर्ति की वजह से। उसी तरह किसी प्रोफीटेबल कंपनी का शेयर सस्ता रेह सकता है, इन्हीं कारणों से। शेयर बाज़ार का मूल्य हमेशा स्टॉक के असली मूल्य का सूचक नहीं होता। एक प्रक्रिया के जरिये स्टॉक का असली मूल्य पता करते हैं। अगर स्टॉक का असली मूल्य मार्केट में चल रही स्टॉक कीमत से भी कम है तो निवेशक उस स्टॉक को खरीदतें हैं। जब वो अपने असली कीमत से ज्यादा कीमत का हो जाता है तो निवेशक उसे बेच देता है। इस उपाय में थोड़ा जोखिम कम है क्योंकि निवेशक उस कंपनी का स्टॉक खरीद रहा है जिसमे व्यापार में मुनाफे का संभावना है और वो इसे यूजुअल कीमत से कम में खरीद रहा है। इसलिए कमाई होने की पोस्सिबिलिटी ज्यादा है। लंबे समय के लिए निवेश करें- ज़्यादातर स्टॉक मार्केट रिस्क लंबे समय में स्टेबलाइज़ होता है। शॉर्ट टर्म में उतार -छड़ाव ज्यादा रहता है। नए लोगों के लिए वोलटिलिटी शब्द उतार - छड़ाव के लिए इस्तेमाल होता है। जितना वो हर मिनट में उतरता या चढ़ता है उतना ही ज्यादा वो स्टॉक वोलाटाइल होता है। जब आप एक स्टॉक को हर दिन ट्रेड कर रहे हो तो रिस्क ज्यादा है। लेकिन लंबे समय में ये उतार चढ़ाव ज्यादा माने नहीं रखते अगर स्टॉक की कीमत बढ़ी है। इसलिए निवेशकों को हमेशा लंबे समय के लिए निवेश करने की सलाह दी जाती है। कंपनियों के अच्छे दिन, बुरे दिन होते हैं, लेकिन लंबे समय में जो कंपनी अच्छी बिज़नस समझ रखती है सामान्य तौर से उसकी कीमतें बढ़ती हैं। रूपी कोस्ट अवेरजिंग - यह फंडा म्यूचुअल फंड्ज और शेयर बाज़ार निवेश में बहुत चर्चित है क्योंकि मूल्य निवेश की तरह इससे "दाम में खरीदने " का रिस्क कम कर सकते हैं। रूपी कोस्ट अवेरगिंग में निवेशक एक फ़िक्स्ड पैसा, फ़िक्स्ड समय ओर फ़िक्स्ड स्टॉक या म्यूचुअल फ़ंड में लगाता है। शेयर की कीमतें हर मिनट और म्यूचुअल फ़ंड के यूनिट हर दिन बढ़ते घटते हैं। जिसकी वजह से कभी आपको कम शेयर/ यूनिट मिल जाएगी लेकिन कभी - कभी आपको उसी कीमत में बहुत सारे शेयर/ यूनिट मिल जाएँगे। आपका कोस्ट ऑफ शेयर या कोस्ट ऑफ म्यूचुअल फ़ंड यूनिट एव्रेज हो जाता है। कंपऔंडिंग की ताकत का फायदा उठाएँ- इसका मतलब है कम्पाउण्ड इंटरेस्ट (हाँ स्कूल मैं पढ़ी थी यह चीज़) इसका मतलब होता है इंटरेस्ट पे इंटरेस्ट कमाना। हर बार आप मूलधन पे ब्याज़ कमाते हो तो वो ब्याज़ भी मूलधन बन जाता है और अगली बार आपको उसपर भी ब्याज़ मिलता है। सोच लो आप ₹1000 निवेश करते हो जैस्पर आपको 10% का फ़िक्स्ड ब्याज़ मिल रहा है आपका निवेश पहले ब्याज़ के बाद ₹ 1,100 और दूसरे ब्याज़ के बाद ₹1,210 बन जाएगा। अपने शेयर बाज़ार और म्यूचुअल फ़ंड की कमाई को फिर से निवेश करना ताकि कैपिटल अमाऊंट बढ़ता रहे। अपने आर्थिक लक्ष्यों में निवेश करते रहें, आप अपने आर्थिक लक्ष्यों में निवेश करके आप लोन लेने और उस पर ब्याज देने से बच सकते हैं। सामान्य रूप से ब्याज देना निवेश के नियमों से विपरीत है,उल्टा आपको ब्याज़ सिर्फ कमाना है।गाड़ी खरीदना चाहते हो क्यों न उसके लिए निवेश करो? निवेशक म्यूचुअल फ़ंड में 3 से 5 साल का मीडियम से ज़्यादा रिस्क वाला टर्म इनवेस्टमेंट कर सकते हैं या अपनी राशि अपने अनुसार अनुभव और रुचि अनुसार स्टॉक में लगा सकते हैं। खास तौर पर चीज़ें जैसे छुट्टियाँ, घर के उपकरण, कार, बाइक आदि के लिए पहले से निवेश किया जा सकता है और अपनी मर्ज़ी से भुगतान किया जा सकता है। अगर आप सही तरह से प्लान करते हैं तो हो सकता है आप कुछ मूल धन की राशि अपने पास भी बचा सकें। अगर आपकी आमदनी कम है और आपको कुछ लोन लेना भी पड़ता है तो यह पूरी राशि लोन पर लेने और ज़्यादा ब्याज़ भरने से तो अच्छा है। ज़्यादा ब्याज़ वाले कर्ज़ को पहले चुकाओ- अपने क्रेडिट कार्ड पर लेट पेमेंट फी और जुर्माना भरना बेवकूफी है, आप अपना पैसा ऐसे फ्री में मत देना किसी इन्शुरेंस कंपनी को। अब तो नो कोस्ट ई एम आई पर भी मिल जाता है लेकिन क्रेडिट कार्ड के उधार में मत फस जाना क्योंकि इसमें आप अपने आउट स्टेंडिंग राशि से 25% से 40% ज़्यादा पे करते हो। एक बात अभी समझ लो न्यूनतम ड्यू वो राशि है जो आपको अपने क्रेडिट कार्ड को चालू रखने के लिए भरनी होती है और बाकी पैसों पे ब्याज़ वो भी कम्पाउण्ड इन्टरेस्ट लग रहा है। इसलिए जितना ज़्यादा से ज़्यादा दे सकते हो उतना अच्छा। अगर आप नौकरीपेशा हो, आपकी अछि सैलरी है और कोई डिपेंडेंट नहीं है तो आप थोड़ा रिस्क ले सकते हो। डिपेंडेंट मतलब आपका पति या पत्नी जो नौकरी नहीं करता, पैरेंट्स जो रिटाइर हो चुके हैं, बच्चे या डिसब्लेड भाई- बहन जो आर्थिक रूप से आप पर निर्भर हैं। ऐसा कम ही होता है की आपको अपनी निवेश की राशि की एकदम से जारोरत पद जाये तो अपनी रिस्क अपेटाइट के अनुसार निवेश करें। तो यह जानना रुचिकर था, अपने सीखने की क्षमता को यहीं तक सीमित मत रखिए, हमारे और पॉडकास्ट, वीडियो ,वैबसाइट और यू ट्यूब चैनल भी विसिट कीजिये। चलिये मिलते हैं अगली बार तब तक के लिए एंजेल ब्रोकिंग की तरफ से अलविदा और शुभ निवेश। निवेश बाज़ार जोखिमों के आधीन है कृपया सभी दस्तावेज़ ध्यान से पढ़ लें।